मारवाड़ के ऐसे राजा जिनसे खौफ खाता था औरंगजेब, निधन पर रोए थे बंदर, पढ़ें पूरी कहानी

काबुल के राजदरबार में महाराजा जसवंत सिंह अपने सैनिकों के साथ ईरानी शासक को हराने की योजना बना रहे थे। तभी गुप्तचरों ने उनको सूचना दी कि मुगल शासक औरंगजेब ने जोधपुर के सभी मंदिरों को गिराने का आदेश दिया है। इसके बाद जवसंत सिंह बड़े ही चिंतित हो उठे। फिर उन्होंने औरंगजेब के आदेश पर पलटवार करते हुए ऐसा आदेश दिया कि औरंगजेब को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। मरुधरा के बाहुबली में आज बात महाराजा जसवंत सिंह की।
राजस्थान वीर-वीरांगनाओं की भूमि रही हैं। इस मिट्टी ने एक से बढ़कर एक वीरों को जन्म दिया है। कुछ वीर तो ऐसे हैं जिन्होंने हमारे देश के बाहर भी अपनी मातृभुमि का मान बढ़ाया। राजस्थान की मारवाड़ रियासत के राजा कभी भी मुगलों के आगे नहीं झुके। राव जोधा से लेकर राव मालदेव और महाराजा जसवंत सिंह से लेकर दुर्गादास राठौड़ तक अगर मारवाड़ के इतिहास का जिक्र होगा तो इन वीरों का नाम जरूर स्मरण किया जाएगा। आज जानते हैं ऐसे ही एक वीर महाराजा जसवंत सिंह के बारे में जिनके लिए कहा जाता है कि उनकी मृत्यु पर बंदर और पशु-पक्षी भी रोए थे।
महाराणा जसवंत सिंह की जीवनी के बारे में जानने से पहले उनके एक किस्से के बारे में जान लेना चाहिए जो काफी चर्चित भी है। एक बार औरंगजेब ने महाराजा जसवंत सिंह को काबुल भेजा। उधर औरंगजेब ने आदेश दिया कि जोधपुर के सारे मंदिर तोड़ दिए जाएं। जब इस बात की जानकारी काबुल मिशन पर गए जसवंत सिंह को लगी तो उन्हें बड़ी चिंता हुई कि वे जोधपुर की जनता को क्या कहेंगे? इसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि काबुल में जितनी भी मस्जिदें हैं उन्हें ढहा दिया जाए। जब इस बात की जानकारी औरंगजेब को हुई तो वह आग-बबूला हो गया। इसके बाद औरंगजेब को डरकर अपना फैसला बदलना पड़ा था।
इसलिए मिशन पर भेज देता था औरंगजेब
महाराजा जसवंत सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1626 को बुरहानपुर में हुआ था। वे गजसिंह प्रथम के सबसे बड़े पुत्र थे। जसवंत सिंह और तीन भाई थे। उनके छोटे भाई अमर सिंह बड़े ही गुस्सैल प्रवृति के थे। उनके किस्से भी हम आपको कभी सुनाएंगे। लेकिन आज बात जसवंत सिंह की।
जसवंत सिंह एक ऐसे राजा थे जिनसे औरंगजेब भी भयभीत रहता था। वह जसवंत सिंह से इतना भयभीत रहता था कि अक्सर उन्हें मिशन पर भेज देता था। जसवंत सिंह को शाहजहां ने आगरा का सुबेदार नियुक्त किया था। 1648 में ईरान के शासक शाह अब्बास ने काबुल पर हमला कर दिया। उस समय जवसंत सिंह और औरंगजेब साथ-साथ थे। हालांकि इस युद्ध में औरंगजेब की सेना युद्ध हार गई। 1655 में शाहजहां ने जसवंत सिंह को महाराजा की उपाधि दी।
रानी ने दरवाजा खोलने से किया मना
औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच सत्ता को लेकर हुए संघर्ष में भी उन्होंने दारा शिकोह का साथ दिया। औरंगजेब और जसवंत सिंह के बीच धरमत नामक स्थान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में जसवंत सिंह बुरी तरह घायल हो गए। इसके बाद उनके साथी उन्हें युद्ध के मैदान से दूर ले गए। जब वे किले के गेट पर पहुंचे तो रानी ने दरवाजा खोलने से मना कर दिया। इसके बाद उनकी मां ने रानी को मनाया, फिर किले के दरवाजे खुले और वे अंदर पहुंचे इलाज हुआ और स्वस्थ हुए।
औरंगजेब के खिलाफ लड़ने के बावजूद जसवंत सिंह और मुगल शासक के खिलाफ कभी मनमुटाव नहीं हुआ। महाराजा जसवंत सिंह इतने वीर थे कि औरंगजेब उनसे डरता था। ऐसे में वह उन्हें दुश्मनी करने की बजाय दोस्ती रखना चाहता था। लेकिन वह उन्हें कभी भी एक जगह पर टिकने नहीं देता था। ईरानी शासक से मिली हार का बदला लेने के लिए औरंगजेब ने उनको काबुल भेज दिया। जहां 1679 में वे मुगलों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
जसवंत सिंह के लिए कहा जाता है कि वे इतने दयालु स्वभाव के थे कि जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो वहां मौजूद बंदर भी रोने लगे थे। उनकी मौत के बाद उनके पुत्र अजीत सिंह को महाराजा बनाने के लिए वीर दुर्गादास राठौड़ का बड़ा योगदान था। उनके पुत्र को मारने के लिए औरंगजेब ने कई तरकीबें अपनाई लेकिन दुर्गादास राठौड़ ने उनको हर बार विफल कर दिया।
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