40 साल पहले की गलती दोहरा रही कांग्रेस? पहले ट्रिपल तलाक अब 33% आरक्षण पर बवाल!

Women reservation: केंद्र सरकार विशेष सत्र बुलाकर 3 विधेयक पेश कर रही है। लेकिन विपक्ष हल्ला बोलने के मूड पर है। कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष नारी शक्ति वंदन अधिनियम का परिसीमन के बहाने विरोध कर रहा है। लेकिन शायद कांग्रेस ये भूल रही है कि जो काम उसने 40 साल पहले किया था। शाहबानो को खून के आंसू रुलाने का। अब महिला आरक्षण का विरोध कर वो फिर से वही काम करने जा रही है। लेकिन इस बार उसे इसकी कितनी कीमत चुकानी होगी, ये तो आने वाला वक्त बताएगा। बीजेपी सरकार ने जिस ट्रिपल तलाक को हमेशा के लिए खत्म किया। उसे कभी कांग्रेस ने कानूनी वैध कहकर बचाने की कोशिश की थी। आज उसी कांग्रेस, उसी विपक्ष को 33% महिला आरक्षण चुभ रहा है। ऐसे में सवाल सीधा है कि क्या कांग्रेस 40 साल बाद, 1986 वाली ऐतिहासिक भूल दोबारा करने जा रही है? क्या फिर एक बार शाहबानो जैसी लाखों महिलाएं अपनी ही संसद के फैसले से ठगी जाएंगी?
महिलाओं के पक्ष में फैसले में भी विपक्ष का विरोध
गुरुवार को संसद के विशेष सत्र में केंद्र की तरफ से 3 विधेयक पेश किए गए। संविधान में 131वां संसोधन, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी में महिला आरक्षण लागू करने वाला बिल और नया परिसीमन कानून। इन सभी के विरोध में कांग्रेस है। पार्टी कोई भी हो—लेकिन महिलाओं को राजनीति में 33% अधिकार मिलना चाहिए या नहीं। इस पर सबसे ज़्यादा बेचैनी कांग्रेस और उसके सहयोगियों में क्यों? जब फैसले महिलाओं के हक़ में आते हैं। तो सबसे ज़ोरदार ब्रेक लगाने का ठेका विपक्ष ही क्यों उठाता है।
राजीव गांधी सरकार ने ट्रिपल तलाक को बनाया कानूनी
साल 1985, जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक के बाद 62 साल की शाहबानो को कहा था कि तुम्हें गुजारा भत्ता मिलेगा। तुम्हारे अधिकार तुमसे कोई नहीं छीन सकता। लेकिन क्या हुआ, इस फैसले के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों का ऐसा दबाव केंद्र पर आया कि राजीव गांधी सरकार ने 1986 में एक नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पलट दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि शाहबानो जैसी महिलाओं का हक़, उनका अधिकार सीधे संसद की मेज़ पर कुर्बान कर दिया गया। लेकिन जिस शाहबानो को कांग्रेस ने खून के आंसू रुलाए। उसके चेहरे पर 1 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने मुस्कुराहट लाकर दी। क्योंकि इसी दिन ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी घोषित किया गया था और इसके लिए कानून बनाया गया था। इससे पहले 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक कह कर रद्द कर दिया था।
ऐसे में सवाल है कि क्या 2026 में कांग्रेस एक और ऐतिहासिक भूल दोहराने जा रही है। क्या महिला आरक्षण भी 1986 के शाहबानो कानून की तरह राजनीतिक सौदेबाज़ी में गिरवी रख दिया जाएगा। यानी—जहां महिलाओं को इंसाफ़ मिला। वहां कानून लेकर आई बीजेपी और आज जब संसद में महिला आरक्षण लागू करने की बात की जा रही है तो परिसीमन का बहाना लेकर सबसे पहले विरोध कांग्रेस, सपा समेत पूरा विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।
40 साल पहले की गलती दोहरा रही है कांग्रेस
कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष से सवाल है कि क्या ये संयोग है कि महिलाओं की जब-जब बात होती है। ये अटैकिंग मोड में आ जाते हैं। ये तो वही बात हो गई कि महिला अधिकार की बात तो करेंगे लेकिन पहले राजनीति भर-भर कर करेंगे। लेकिन कांग्रेस को एक बात अच्छे से पता होनी चाहिए कि महिला आरक्षण कोई राजनीतिक ऑफर नहीं। ये देश के आधी आबादी का अधिकार है। कांग्रेस आज चाहे कितना भी विरोध कर ले लेकिन 40 साल बाद इतिहास यही लिखेगा कि ट्रिपल तलाक खत्म करने का साहस BJP ने किया। शाहबानो के अधिकार छीनने वाली कांग्रेस आज महिला आरक्षण पर भी अटकी है। अब फैसला भारत की जनता करेगी कि 1986 की कहानी दोहरानी है या असली “नारी शक्ति वंदन” का रास्ता खोलना है। अब नारी के अधिकारों से खिलवाड़ बंद कीजिए। भारत अब 1986 वाला नहीं है।
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