दक्षिण भारत का पहला ‘कुंभ’! क्या चुनाव से ठीक पहले केरल में हिंदू वोट बटोरने की कोशिश?

Kerela Kumbh: केरल में 37 हजार की आबादी वाला एक छोटा सा कस्बा तिरुनावाया, पूरे दक्षिण भारत का धर्म और राजनीति का केंद्र बन गया है। ये वही जगह है, जहां 259 साल बाद पहली बार ‘दक्षिण भारत का पहला कुम्भ’ गूंज उठा है। वो भी केरल चुनाव के ठीक 3 महीने पहले। तिरुनावाया स्थित नीला नदी, जिसे दक्षिण की गंगा भी कहा जाता है, उसके तट पर ही ये आयोजन हो रहा है। ये 18 जनवरी से 3 फरवरी तक चलेगा। इसे आयोजक ‘दक्षिण भारत का पहला कुम्भ’ कह रहे हैं। चौंकाने वाली बात यहां ये है कि यहां ना तो प्रयागराज के कुंभ की तरह कोई टेंट सिटी है, ना ही यहां कोई सरकारी पैसा लगा है। यहां के स्थानीय लोग ही अपने घर खोलकर मेहमाननवाज़ी कर रहे हैं।
259 साल बाद पहली बार हो रहा आयोजन
दरअसल जूना अखाड़ा और भारतीय धर्म प्रचार सभा ने 259 साल से बंद पड़ी इस परंपरा को फिर जगा दिया है। जैसे उत्तर में प्रयाग पितृ तर्पण का केंद्र है, वैसे ही दक्षिण में उसकी जगह तिरुनावाया ले रहा है। यहां 12 ब्राह्मण हर शाम नीला नदी की आरती करेंगे। अनुमान लगाया जा रहा है इस विशाल आयोजन में 5 लाख से ज्यादा लोग पहुंचेंगे। लेकिन यहां कोई VIP ट्रीटमेंट आपको नहीं मिलेगा, ना ही वैसा कोई कल्चर यहां पर है। यहां इस आयोजन की कोई लाउड पोस्टरबाज़ी भी नहीं है। यहां 1500 से ज्यादा घर खुद लोगों को स्वागत करने के लिए आगे आ रहे हैं।
अप्रैल में केरल में चुनाव
22 जनवरी को तमिलनाडु से एक रथयात्रा तिरुनावाया पहुंचेगी, जिसमें 5 हजार वॉलेंटियर्स, 12 हजार भक्त प्रसाद वितरण के इंतजाम में होंगे। यहां राजस्थान के पुष्कर के बाद ब्रह्मा जी का दूसरा मंदिर भी स्थित है, जिसका जीर्णोद्धार भी 1300 साल पहले हुआ था। लेकिन अभी भी मुद्दा वही कि ये सिर्फ धार्मिक आयोजन है या तगड़ी राजनीति का केंद्र भी है? सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि केरल में चुनाव सिर पर हैं। अप्रैल-मई में यहां विधानसभा चुनाव होने हैं। तो क्य़ा ये आयोजन हिंदू वोट को बटोरने के लिए है?
केरल में हिंदू वोट बटोरने की जुगत में पार्टियां
दरअसल केरल में 55% वोट हिंदुओं के हैं। यहां की कुल जनसंख्या साढ़े 3 करोड़ है जिसमें हिंदू वोटर लगभग 2 करोड़ हैं। यहां 3 पार्टियां ही मुख्य लड़ाई में हैं, LDF, UDF और BJP. 2021 के चुनाव में LDF को 45% वोट मिले थे, जिसमें सबसे ज्यादा एझावा और दलित वर्ग के थे। कांग्रेस नीत UDF के हिस्से में 38% वोट आए। इसमें नायर और ओबीसी वोटर्स सबसे ज्यादा थे। जबकि BJP को सिर्फ 12% वोट मिले थे, जिनमें ब्राह्मण, नायर, एझावा, तीनों का लगभग बराबर वोट था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में ये आंकड़े बदल गए। LDF का वोट परसेंट गिरकर 33.6 रह गया। UDF का बढ़कर 45 हो गया तो BJP का भी वोट परसेंट बढ़कर 19 हो गया। इसलिए हिंदू वोटर अब सियासत का पॉवर सेंटर बन गए हैं।
हिंदुओं को लुभाने के लिए ही राज्य सरकार बीते साल सितंबर में अंतर्राष्ट्रीय अयप्पा सम्मेलन कर चुकी है। वहीं इस साल के नगर निकाय चुनाव में राजधानी तिरुवनन्तपुरम में बीजेपी को शानदार जीत मिली और वोट प्रतिशत भी बढ़ा, जिससे बीजेपी में अब उत्साह चरम पर है। सियासी जानकार कह रहे हैं कि इन सब समीकरणों के चलते इस दक्षिण के कुम्भ को सिर्फ धार्मिक शो नहीं समझा जा सकता। ये केरल की जमीन पर गहरे मायने रखता है। अब इसका फायदा किसे मिलेगा और कितना मिलेगा, ये तो चुनावी महीनों में पता चलेगा।
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