देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु, जानिए गाजियाबाद के हरीश की कहानी?

Euthanasia: देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जिसने अब मानवीयता के नए मायने गड़ दिए हैं। दरअसल कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को परमिशन दे दी है और ये परमिशन मिली है गाजियाबाद के रहने वाले 30 साल के हरीश राणा को जो पिछले 13 सालों से बिस्तर पर पड़े हैं। हरीश के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट से हरीश के मेडिकल उपकरण हटाने की मांग के लिए एक याचिका दायर की थी, जिस पर बुधवार को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए हामी भर दी है।
क्या हुआ है हरीश राणा को?
दरअसल हरीश राणा 2013 में वे एक हादसे का शिकार हुए थे। उस वक्त वो 17 साल के थे और कॉलेज में पढ़ते थे। वे एक बिल्डिंग की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए थे। जिससे उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई और तब से वे कोमा में हैं। सालों के इलाज के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। वे 100% दिव्यांगता और क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं। उन्हें सांस लेने, खाने और देखभाल के लिए पूरी तरह जीवन रक्षक मेडिकल उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
उनके माता-पिता ने सबसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने मेडिकल बोर्ड से ये जांच कराने की मांग की थी कि क्या निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर विचार किया जा सकता है। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने ये याचिका खारिज कर दी और कहा कि भारतीय कानून सक्रिय इच्छामृत्यु की इजाज़त नहीं देता। इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। यहां इस पर विस्तृत सुनवाई हुई और मानवीय आधार पर समाधान खोजने की पहल की।
क्या किया सुप्रीम कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड गठित करवाया, जिसने राणा के घर जाकर उनकी हालत का मौका-मुआयना किया। बोर्ड ने कहा कि हरीश राणा की हालत में सुधार की संभावना लगभग जीरो है और वे पूरी तरह उपकरणों पर निर्भर हैं। इसके बाद कोर्ट ने एम्स, नई दिल्ली (AIIMS, New Delhi) के विशेषज्ञों का एक दूसरा मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया ताकि उनके हालातों की स्वतंत्र जांच की जा सके। इससे पहले नवंबर 2024 में कोर्ट ने घर-आधारित मेडिकल केयर उपलब्ध कराने के सरकारी प्रस्ताव को स्वीकार किया था, जिसके अंतर्गत फिजियोथेरेपी, डाइटरी सपोर्ट, नर्सिंग केयर और मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई थी।
क्या है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु यानी पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित या कोमा में जा चुके मरीज वो मेडिकल उपकरण हटा दिए जाते हैं, जो जीवन रक्षक होते हैं। जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब। इससे उनकी प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है। भारत में ये 'गरिमा के साथ मृत्यु' के अधिकार के तहत मान्य है। वहीं कई देशों में ये गैर-कानूनी है।
इस लिंक को शेयर करें

