स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश! कांग्रेस ने सदन में लगाया पक्षपात का आरोप, 10 घंटे चलेगी बहस

Non Confidence Motion Against Speaker Om Birla: विपक्ष ने लोकसभा सदन में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है। मंगलवार 10 मार्च को कांग्रेस सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद ने अविश्वास प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों के समर्थन के साथ सदन में रखा। पीठासीन जगदम्बिका पाल ने प्रस्ताव को मंज़ूरी दी और प्रस्ताव पर सदन में 10 घंटे की बहस का समय तय हुआ। (Avishwas Prastav)
प्रस्ताव की शुरुआत कांग्रेस सांसद ने की। गौरव ने आरोप लगाए कि स्पीकर ओम बिरला सदन की कार्यवाही में पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) को बोलने नहीं दिया जा रहा। विपक्षी नेताओं के माइक बंद कर दिए जा रहे हैं। विपक्ष को बार-बार टोका जा रहा है।
गौरव गोगोई ने (Gaurav Gogoi) बहस के दौरान कहा - देश का नेतृत्व कमजोर और कायर हो गया है। सदन के दौरान राहुल गांधी को भाषण देते वक़्त 20 बार रोका और टोका गया, उन्हें रूलिंग बुक दिखाई गयी। अपने भाषण में सिर्फ एक आर्टिकल का हवाला देने पर राहुल को रोका गया, लेकिन सत्ता पक्ष सांसदों के द्वारा भारत में बैन किताबें दिखाने पर भी उन्हें कुछ नहीं कहा गया। ऐसा पक्षपाती रवैया सदन में स्वीकार्य नहीं।
स्पीकर ओम बिरला पर लगाये गए मुख्य आरोप
1. नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी को अपनी बात कहने से रोका गया और भाषण के दौरान कई बार रोका गया।
2. 9 फ़रवरी को शशि थरूर के भाषण के दौरान उनका माइक बंद कर दिया गया। सरकार कहती है कि बोलिए, लेकिन जब माइक ही बंद हो, तो कोई कैसे बोले?
3. स्पीकर ने महिला सांसदों पर सवाल उठाए। ओम बिरला ने कहा कि महिला सांसदों ने पीएम की कुर्सी को घेर लिया था। पीएम के साथ कुछ भी हो सकता था। किस आधार पर ओम बिरला ने ये आरोप लगाया।
राहुल गांधी ने सदन के बाहर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव है, जिसकी वजह से वे संसद से दूर भाग रहे हैं। गोगोई ने कहा कि ये प्रस्ताव लाते हुए हमें बिलकुल भी ख़ुशी नहीं हो रही है, लेकिन हमें मजबूरी में अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ रहा है। ये हमारा ओम बिरला पर कोई निजी हमला नहीं है, लेकिन संविधान और सदन की गरिमा को बचाने के लिए हमें ये प्रस्ताव लाना पड़ रहा है।
हालाँकि, सदन में एनडीए की बहुमत होने के वजह से अविश्वास प्रस्ताव के पास होने की संभावना कम है, लेकिन यह संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है।
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