जयपुर में 'राष्ट्र साधना के 100 वर्ष' पर भव्य काव्य संध्या, कवियों ने जगाई देशभक्ति की लौ

'राष्ट्र साधना के 100 वर्ष' पूरे होने पर जयपुर के अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने रविवार शाम मानसरोवर में एक यादगार काव्य संध्या का आयोजन किया। कार्यक्रम में देश के और राजस्थान के कई बड़े और राष्ट्रभक्त कवि पहुंचे और उन्होंने अपनी ओजस्वी कविताओं से पूरे पंडाल को देशभक्ति की भावना में डुबो दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत मां भारती और मां शारदा के तस्वीरों के सामने दीप जलाने से शुरू हुई। बांसवाड़ा के कवि बृजमोहन तूफान ने मंच पर पहली कविता सरस्वती वंदना पढ़कर शुभारंभ किया। कार्यक्रम के संयोजक रवि पारीक ने बताया कि साहित्य परिषद का जयपुर में यह पहला ऐसा बड़ा आयोजन था, जिसमें कई राज्यों के कवियों ने भाग लिया और सुनने वालों के मन में देशभक्ति की लहर दौड़ा दी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सिविल लाइन विधानसभा के विधायक गोपाल शर्मा रहे। गोपाल शर्मा ने कहा कि भारतीय काव्य परंपरा में देशभक्ति और संस्कृति हमेशा ही मिली हुई रही है। उन्होंने सभी कवियों का स्वागत किया और उनकी कविताओं की तारीफ की।
दिल्ली से डॉ. प्रवीण आर्य ने 'वंदे मातरम' की पंक्तियों से मातृभूमि की वंदना की, जबकि दास आरोही ने भारतीय संस्कारों पर कविता सुनाई। विनीत चौहान ने वीर रस की ओजस्वी कविताओं की प्रस्तुत की। बीकानेर की मोनिका गौड़ ने नारी शक्ति का गुणगान किया, वहीं बाड़मेर के गोरधन सिंह सोढा 'जहरीला' ने राजस्थानी में विभाजन के दर्द को कविताओं के ज़रिये लोगों के सामने रखा।
कोटपुतली के नवनीत गौड़, उदयपुर के सुरेंद्र सिंह राव, चित्तौड़गढ़ के कृष्णार्जुन पार्थभक्ति, कोटा के राजेंद्र गौड़ और महाराष्ट्र के प्रवीण श्रीराम देशमुख ने भी अपनी कविताओं में संघ के कार्य, प्रचारकों के त्याग और भारत के विश्व गुरु बनने के संकल्प को प्रस्तुत किया।
जयपुर के प्रसिद्ध गीतकार विकास तिवारी 'प्रज्ञेय' ने शताब्दी वर्ष पर विशेष आह्वान गीत "भारत ने भारत में फिर से जीना सीखा..." गाया। उन्होंने प्रचारक के बलिदान पर भी गीत प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के बीच-बीच में 'भारत माता की जय' के नारे गूंजते रहे।
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