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Telangana: नए-नए मंत्री बने मोहम्मद अजहरुद्दीन के सरकारी बंगले के रेनोवेशन पर 76 लाख खर्च, विपक्ष ने लगाया फिजूलखर्ची का आरोप

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राजनीति
30 Jan 2026, 02:10 pm
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रिपोर्टर : Dushyant

Mohammad Azharuddin Bungalow Renovation Controversy: तेलंगाना की राजनीति में एक नया मुद्दा विवाद बन गया है। सरकार ने पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान और हाल ही में कैबिनेट में शामिल हुए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन के सरकारी आवास की मरम्मत के लिए 76 लाख रुपये की मंजूरी दी है। जैसे ही इस काम के लिए मंज़ूरी की खबर सामने आई, स्थानीय राजनेताओं और जनता का विरोध मिलना शुरू हो गया। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार कहती है कि उनके पास विकास कार्य के लिए फण्ड नहीं है, और दूसरी तरफ नेताओं के आवास की मरम्मत के लिए लाखों खर्च किये जा रहे हैं।


जानकारी के अनुसार, बंजारा हिल्स इलाके में स्थित मिनिस्टर क्वार्टर नंबर 29 लंबे समय से खाली पड़ा था। करीब 15 सालों से उपयोग न होने के कारण यह जर्जर हो चुका था। सड़क एवं भवन विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इस रेनोवेशन में छत की वॉटरप्रूफिंग, फर्श पर टाइल्स लगाना, यूपीवीसी खिड़कियां फिट करना, मॉड्यूलर किचन तैयार करना, दीवारों की मरम्मत और पेंटिंग जैसे कार्य शामिल हैं। विभाग का कहना है कि अप्रूवल के तहत जो काम किये जाने हैं, वो जगह को रहने लायक बनाने के लिए ज़रूरी बेसिक रिपेयर वर्क हैं, और किसी तरह की लक्ज़री से जुड़े हुए नहीं हैं।


आपको बता दें कि तेलंगाना में पिछले दो हफ़्तों में ही सरकार ने दो मंत्रियों के आवासों की मरम्मत के लिए एक करोड़ रुपये से अधिक खर्च मंजूर किया, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री के बंगले पर 30 लाख रुपये का खर्चा भी शामिल है। विपक्ष इस पर कड़ी प्रतिक्रिया कर रहा है। उनका आरोप है कि तेलंगाना सरकार कल्याणकारी योजनाओं, कर्मचारियों और पूर्व विकास कार्यों के बकाया भुगतान और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए फण्ड की कमी बताती है, लेकिन मंत्रियों के घरों पर लाखों रुपये बहा रही है। एक विपक्षी नेता ने सवाल उठाया, "जनता की जरूरतें पहले हैं या मंत्रियों की सुविधाएं?"


सरकार ने सफाई देते हुए कहा कि यह सरकारी आवास काफी पुराना था और ज़र्ज़र हालत में था। कैबिनेट मंत्री को आवंटित होने के बाद इसमें मरम्मत कार्य करवाया जाना बेहद जरूरी था। यह घटना हाल ही में दिल्ली में हुए विवादों से मिलती जुलती है, जहां सरकारी खर्च को लेकर बहस छिड़ी थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे फैसले सरकार की छवि को गलत असर दाल सकते हैं।


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