Rajasthan 7000 School merge: सरकार बदली तो स्कूल बंद! राजस्थान में ‘मर्ज मॉडल’ पर फिर सियासी खेल?

Rajasthan School merge: राजस्थान में सरकार बदलती है—और स्कूलों का भविष्य भी। आज की सरकार हो या पिछली, परंपरा एक ही रहती है। दूसरी सरकार के बनवाए स्कूलों को बंद करने की कवायद शुरू कर दो और ये सिलसिला नया नहीं। जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, तब भाजपा शासन में खुले स्वामी विवेकानंद राजकीय मॉडल स्कूल बंद कर दिए गए। आज फिर वही कहानी दोहराई जा रही है—बस चेहरे बदले हैं, तरीका वही है। दरअसल राजस्थान में 7000 स्कूल मर्ज करने की तैयारी की जा रही है। राज्य सरकार ने सभी जिलों के अधिकारियों को जयपुर बुलाया है और कह दिया है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूल—मर्ज होंगे।
इस फैसले की शर्तें तय की गई हैं कि 15 से कम बच्चों वाले प्राथमिक स्कूल और 25 से कम बच्चों वाले उच्च प्राथमिक स्कूल मर्ज होंगे। यानी एक स्कूल तो बंद होगा। इन्हें नज़दीकी भवनों वाले स्कूलों में जोड़ने का प्रस्ताव तैयार है। जानकारी के मुताबिक से लगभग 7000 स्कूल चिन्हित किए जा चुके हैं। पिछले 2 सालों में पहले ही 405 स्कूल मर्ज किए जा चुके हैं। अब अगला बड़ा फेज़ शुरू होने वाला है।
कांग्रेस ने बीजेपी सरकार के विवेकानंद स्कूलों के साथ भी यही किया था
यहां एक बात गौर करने वाली है कि जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। तब भाजपा शासन में खुले स्वामी विवेकानंद मॉडल स्कूल और कई अन्य अंग्रेजी माध्यम संस्थान बंद कर दिए गए थे। तर्क था कि कम नामांकन वाले स्कूलों को चलाने का कोई मतलब नहीं है। आज की सरकार भी बिल्कुल वही तर्क दे रही है।
यानी पार्टी चाहे कोई भी हो, दूसरी सरकार के काम को काटने का पैटर्न कभी रुकता नहीं। ऐसे में राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था दो ध्रुवों में बंटी हुई है। एक तो ये कि कई स्कूलों में छात्र बहुत कम हैं और कई स्कूलों में क्षमता से ज्यादा भीड़ है। शिक्षक उपलब्ध नहीं—कमरा उपलब्ध नहीं—और सिस्टम का बोझ सिर्फ बढ़ता जाता है। यही वजह है कि सरकार अब छोटे स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिलाकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। जहां टीचर्स की जरूरत है वहीं भेजे जाएंगे।
महात्मा गांधी अंग्रेजी मीडियम स्कूल भी राडार पर
राजस्थान प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक संघ ने सीधे कह दिया कि हर साल स्कूल मर्ज की कैलेंडर आधारित नीति तय करो। क्योंकि जुलाई 2025 में मर्ज हुए स्कूलों के शिक्षक बिना काम के वेतन ले रहे हैं। स्थायी नीति न होने का खामियाज़ा—सिस्टम भी भुगत रहा है और स्टाफ भी। अब केवल कम छात्र संख्या वाले हिन्दी माध्यम स्कूल नहीं, अंग्रेजी माध्यम वाले महात्मा गांधी स्कूल भी इस लिस्ट में आ गए हैं।
सरकारों की तनातनी में स्कूलों की बलि?
सियासी जानकारों का कहना है कि तो क्या ये माना जाए कि राजस्थान में शिक्षा की लड़ाई अब सिर्फ बच्चों की नहीं—सरकारों की बनी हुई है। सरकार बदलो तो स्कूलों की लिस्ट बदल जाती है। लेकिन एक सच नहीं बदलता, वो दूसरी सरकार के बनाए स्कूलों को बंद या मर्ज करना। उसी राजनीति के बीच असली सवाल यही है कि क्या बच्चों की पढ़ाई सिस्टम की प्राथमिकता बनेगी या फिर अगले चुनाव तक स्कूलों की ये लिस्ट भी सिर्फ एक “राजनीतिक फाइल” बनकर रह जाएगी?
इस लिंक को शेयर करें

