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Khejadi Bachao: खेजड़ी कटाई पर गुस्से में मारवाड़! क्या है खेजड़ी बचाओ आंदोलन का सच?

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राजस्थान
03 Feb 2026, 05:52 pm
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रिपोर्टर : ज्योति शर्मा

राजस्थान में खेजड़ी काटने वालों की कुल्हाड़ी सिर्फ पेड़ों पर नहीं चल रही बल्कि ये वार संस्कृति पर है, आस्था पर है और पूरे मरुस्थल की जीवनरेखा पर है। बीकानेर में ‘महापड़ाव’ जारी है, हजारों लोग सड़क पर उतरे हैं और खेजड़ी के ताबूत गांव–गांव से उठ रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि खेजड़ी को बचाने की लड़ाई अचानक इतनी बड़ी क्यों हो गई और आखिर किसकी मिलीभगत से राजस्थान के राज्य वृक्ष की बेरहमी से कटाई हो रही है?


5,000 साल तक जीने वाला पेड़… लेकिन आज सबसे ज्यादा खतरे में


खेजड़ी वो पेड़ है जो 5,000 साल तक जीवित रह सकता है। लेकिन सोलर प्रोजेक्ट्स, बिजली लाइनों, ठेकेदारों के लालच और सरकारी विभागों की खामोशी ने इसे मौत की कगार पर ला खड़ा किया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिजली उत्पादन के नाम पर खेजड़ी के कत्ल को खुली छूट मिल रही है। खेजड़ी सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि मारवाड़ का ‘ऑक्सीजन सिलेंडर’ है। यही वजह है कि जंगल, गांव और शहरों के लोग गुस्से में हैं और आंदोलन सड़कों तक फैल चुका है। बीकानेर में बिश्नोई समाज, संत–समाज, कई जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से महापड़ाव डालकर सरकार से सख्त कानून बनाने की मांग की है।


बिश्नोई समाज क्यों लड़ रहा है आर-पार की लड़ाई?


खेजड़ी से बिश्नोई समाज का संबंध केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। ये उनके लिए धर्म, संस्कृति, और इतिहास का हिस्सा है। यही समाज है जिसने सदियों पहले कहा था—“सिर सांटे रुख रहे, तो भी सस्तो जाण।” यानी सिर कट जाए, पर पेड़ ना कटे। ये सिर्फ नारा नहीं है। इतिहास में सच हुआ बलिदान है।


खेजड़ली का बलिदान- 363 लोग पेड़ बचाने के लिए शहीद


सन 1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में खेजड़ी बचाने के लिए 363 लोग शहीद हुए थे। महाराजा के आदेश पर सैनिक खेजड़ी काटने पहुंचे। यहां उनका सामना हुआ अमृता देवी बिश्नोई और उनकी तीन बेटियों से। उन्होंने कहा— “पहले हमें काटो फिर पेड़ काटना।” सैनिकों ने सच में उनकी गर्दनें काट दीं। इसके बाद एक–एक कर 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए जान दे दी।


इस घटना को इतिहास का पहला वृक्ष संरक्षण आंदोलन माना जाता है। इसी बलिदान की याद में हर साल 12 सितम्बर को खेजड़ली में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला लगता है। यही कारण है कि खेजड़ी, बिश्नोई समाज के लिए मात्र पेड़ नहीं— बलिदान की पहचान है।


रेगिस्तान की लाइफलाइन क्यों है खेजड़ी?


थार के लोगों के लिए खेजड़ी सिर्फ छाया देने वाला पेड़ नहीं है। यहां के जीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़ा हर पहलू खेजड़ी से प्रभावित होता है। यही पेड़ सबसे कठिन मौसम में भी हरा रहता है। जानवरों के लिए चारे का प्रमुख स्रोत है। इसी से बनती है प्रसिद्ध सांगरी, राजस्थान की शान। सांगरी में 15% प्रोटीन, 50% कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, आयरन, कैल्शियम पाए जाते हैं। खेजड़ी की लकड़ी से घर, हल, ईंधन सब तैयार किया जाता है। कठोर अकाल में यही पेड़ इंसान और पशु दोनों का सहारा बनता है। ये औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके बावजूद सबसे ज्यादा कटाई इसी पेड़ की हो रही है।


राजस्थान का राज्य वृक्ष पर सरकार बचा क्यों नहीं पा रही?


1983 में इसे राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया था। इसे ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है। लेकिन आज बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, नागौर, बाड़मेर और थार क्षेत्र खेजड़ी कटाई का केंद्र बन चुके हैं। स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार केवल सर्वे और नोटिस पर अटकी हुई है। कोई कड़ा कानून नहीं, कटाई पर कोई रोक नहीं, दोषियों पर ना जुर्माना, ना कार्रवाई। इसी लापरवाही ने खेजड़ी बचाओ आंदोलन को बड़ा रूप दे दिया है।


किस दिशा में जाएगी लड़ाई?


राजस्थान की मिट्टी ने खेजड़ी को सिर्फ एक पेड़ नहीं माना बल्कि इसे जीवन, संस्कृति और पहचान माना है। लेकिन आज वही पेड़ विकास परियोजनाओं, ठेकेदारों के गठजोड़ और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ रहा है। बीकानेर का महापड़ाव अब सिर्फ प्रदर्शन नहीं…सरकार को दी गई आखिरी चेतावनी माना जा रहा है। अब फैसले का समय राज्य सरकार का है—क्या खेजड़ी बचेगी, या सोलर पॉलिसी के नाम पर रेगिस्तान का भविष्य उजड़ जाएगा?


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