राजस्थान में होगी पानी की किल्लत? क्या मोड़ लेगा सरकार का रुख? समझिए 100 साल पुराना ये मुद्दा?

Punjab Rajasthan Water: एक बिल जिसकी रकम सुनकर बड़े-बड़े बजट हिल जाएं। ये है 1 लाख 44 हजार करोड़ रुपए का। इसे पंजाब की सरकार राजस्थान से वसूलना चाहती है। जी हां, पंजाब और राजस्थान के बीच पानी की लड़ाई अब सीधे अदालत के दरवाजे पर दस्तक देने वाली है। ये 100 साल पुराने समझौते की वजह से पैदा हुआ है या यूं कहें कि पंजाब ने इसे सियासत के लिए जबरदस्ती पैदा किया है। क्योंकि राजस्थान सरकार के बयान के बाद ये साफ होता नजर आ रहा है कि ये दो राज्यों के बीच टकराव सिर्फ पानी का नहीं बल्कि सियासत और अधिकार का है।
भगवंत मान के आरोपों पर क्या बोली राजस्थान सरकार?
दरअसल पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पिछले दिनों ये कहा था कि राजस्थान पर 1 लाख 44 हजार करोड़ रुपए का बकाया है। क्योंकि राजस्थान दशकों से पंजाब का पानी ले रहा है। लेकिन 66 साल पहले उसके बदले मिलने वाली रॉयल्टी देना बंद कर चुका है। मान ने तो सीधा कह दिया था कि या तो राजस्थान पैसा दे या फिर पानी लेना बंद करे। अब लड़ाई कोर्ट में होगी।
ये बयान आते ही राजनीति का पारा सीधे आसमान छूने लगा। तब बीती शुक्रवार को राजस्थान की सरकार के जलसंसाधन मंत्री सुरेश रावत ने आधिकारिक तौर पर कहा कि राजस्थान, पंजाब को कोई पैसा नहीं देगा। ये पूरी तरह से पंजाब की सियासी साजिश है। उन्होंने कहा कि भगवंत मान चुनाव से पहले पंजाब में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान सरकार बैठक और बातचीत के लिए तो तैयार है। लेकिन किसी तरह का कोई पैसा नहीं देगी।
राजस्थान सरकार ने ये भी साफ किया कि पंजाब से इस विवाद के बावजूद प्रदेश में पानी की कोई दिक्कत नहीं आएगी। राजस्थान के पास गर्मी के इस सीजन के लिए पर्याप्त पानी है। 1920 का शुल्क ब्रिटिश सरकार को दिया जाता था, पंजाब को नहीं। संविधान का अनुच्छेद 262 कहता है कि नदियां राष्ट्रीय संसाधन हैं, कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं हैं। 1955, 1959 और 1981 में बने समझौतों में कहीं भी “रॉयल्टी” का प्रावधान नहीं है।
क्या है ये मुद्दा?
दरअसल ये झगड़ा आज या कल का नहीं, बल्कि 100 साल से भी ज्यादा पुराना है। सन् 1920 में ब्रिटिश सरकार और बीकानेर रियासत के बीच पानी का समझौता हुआ था। राजस्थान को पंजाब से पानी मिलना था और बदले में रकम चुकानी थी। देश की आजादी के बाद भी 1960 तक ये सब चलता रहा। इसके बाद पाकिस्तान के साथ भारत की 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी। लेकिन पंजाब और राजस्थान के बीच पानी का मुख्य विवाद 1981 के त्रिपक्षीय समझौते से शुरू हुआ। ना कि सीधे तौर पर 1960 से।
दरअसल 1981 में रावी-ब्यास नदियों के पानी को राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर के जरिए थार रेगिस्तान और दूसरे राज्यों के बीच फिर से बांटा गया था। इसके मुताबिक पानी देना या रोकना किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि केंद्र की जिम्मेदारी है और केंद्रीय जल आयोग इसकी निगरानी करता है। इस हिसाब से राजस्थान को कोई पैसा पंजाब को नहीं देना है। लेकिन भगवंत मान ये तर्क दे रहे हैं। ये समझौता तो दोनों राज्यों में हुआ है लेकिन 1920 का समझौता तो राजस्थान ने रद्द ही नहीं किया। इसलिए 1960 से 2026 का बकाया राजस्थान को तो देना ही पड़ेगा।
2004 में पंजाब ने रद्द किया था समझौता
पंजाब ने 2004 में पानी के समझौते रद्द कर दिए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें बरकरार रखा और कहा कि राज्य एकतरफा समझौता खत्म नहीं कर सकता। पंजाब का दावा है कि राजस्थान ने इसी का सहारा लेकर भुगतान रोक दिया। लेकिन पुराना 1920 वाला करार कभी खत्म नहीं हुआ। आज भी राजस्थान फिरोजपुर फीडर से 18,000 क्यूसेक पानी ले रहा है।
अब एक तरफ पंजाब—बकाया वसूली के लिए तैयार है। दूसरी दूसरी तरफ राजस्थान इस दावे को अवैध बता रहा है। दोनों राज्यों की राजनीति, किसान हित, और जल अधिकार सब दांव पर लग गए हैं। ऐसे में ये लड़ाई अब पूरी तरह कानूनी मोड़ ले चुकी है। इसका फैसला अब अदालत करेगी लेकिन असर पूरे उत्तर भारत पर पड़ने वाला है।
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