Tyag Pratha: राजस्थान की त्याग प्रथा...जो बन गई राजपूतों के गले की फांस!

Rajasthan Tyag Pratha: कभी राजस्थान में एक शादी सिर्फ खुशियों का मौका नहीं होती थी। क्योंकि बारात के साथ एक और परंपरा आती थी। इसका नाम था त्याग प्रथा। ये नाम सुनकर भले शांत सा लगे पर असल में ये राजपूत परिवारों की कमर तोड़ने वाली रस्म बन चुकी थी। क्या थी ये प्रथा, कैसे इसकी शुरूआत हुई और कैसे इसका खात्मा राजस्थान से हुआ, ये सब कुछ हम आपको इस खबर में बता रहे हैं।
प्रथा निभाने के चक्कर में गरीबी में चले जाते परिवार
दरअसल एक वक्त पर राजपूत समाज में शादी का मतलब था चारण, भाट और ढोली परिवार के दरवाजे पर हाजिर होना। ये सिर्फ आशीर्वाद देने नहीं आते थे बल्कि ये आते थे मुंहमांगी दान-दक्षिणा लेने। इसे ही कहते थे त्याग और अगर घरवालों ने दान कम दिया तो समझिए कि पूरा समाज उस परिवार को ताने मारता, मज़ाक उड़ाता। इस चक्कर में बहुत बार घर की आर्थिक हालत खराब हो जाती। फिर भी लोग प्रतिष्ठा के नाम पर जेब खाली करने पर मजबूर हो जाते थे।
इसमें से भी सबसे ज्यादा बोझ बेटी के पिता पर पड़ता था। लोग अपनी इज्जत दिखाने के लिए ज्यादा से ज्यादा त्याग देने की होड़ में लग जाते थे। ये एक तरह की प्रतिस्पर्धा होती थी कि किसने कितना दान दिया। समाज में दिखावे की ये लड़ाई इतनी बढ़ गई कि इस रस्म ने विकृत रूप ले लिया।
कैसे हुआ इस प्रथा का खात्मा?
दरअसल 1841 में पहला बड़ा कदम उठा जोधपुर राज्य ने राज्य ने त्याग प्रथा पर नियम बनाए। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भी बाकी राजपूताना राज्यों को हिदायत दी कि अब सुधार जरूरी है। इसके लिए उदयपुर के महाराणा सरदार सिंह आगे आए। 1844 में आदेश निकाले गए कि बाहर के चारण-भाट उदयपुर न आएं और उदयपुर के चारण-भाट दूसरे राज्यों में त्याग मांगने न जाएं। इससे बोझ काफी हद तक कम हुआ लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं थी।
1888 में इस पर बड़ा मोड़ आया। जिसने राजस्थान का इतिहास बदल दिया। राजपूताना के A.G.G. कर्नल वाल्टर ने राजपुत्र हितकारिणी सभा नाम की एक संस्था बनाई। इसका उद्देश्य बिल्कुल साफ था कि किसी तरह शादी में होने वाले फिजूलखर्चों को रोका जाए। लड़का-लड़की की सही उम्र में शादी सुनिश्चित करना और सबसे बड़ा मुद्दा, त्याग प्रथा को सीमित किया जाए।
इस पर अजमेर की पहली बैठक में बड़े फैसले हुए। त्याग सिर्फ लड़के का पिता देगा। अगर किसी घर में पहली शादी है। तो सालाना इनकम का 9% से ज्यादा त्याग नहीं दिया जाएगा। इसके बाद की शादी में सिर्फ और सिर्फ 1% त्याग दिया जाएगा। ये फैसले लागू करवाने के लिए हर राज्य में स्थानीय समितियां बनाई गईं और ये भी कहा गया कि अगर इसका उल्लंघन किया गया तो दंड भी दिया जाएगा। इसके बाद धीरे-धीरे ये सुधार केवल राजपूत समाज में नहींबल्कि दूसरी जातियों में भी असर दिखाने लगे। इसके 19वीं सदी के आखिर तक और 20वीं सदी के शुरुआत में नतीजे सामने आने लगे। शादी के खर्चों में कमी आई, त्याग प्रथा की ज़ंजीरें ढीली पड़ने लगीं और समाज एक स्वस्थ दिशा में बढ़ने लगा।
तो त्याग प्रथा, जो कभी प्रतिष्ठा का सवाल मानी जाती थी। लेकिन समय ने दिखा दिया कि समाज तभी आगे बढ़ता है। जब बोझ कम हों और इंसानियत, ज्यादा राजस्थान का ये बदलाव एक मिसाल है कि परंपराओं का सम्मान जरूरी है लेकिन सुधार उससे भी ज्यादा जरूरी।
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