सोते रहे गए रविंद्र सिंह भाटी, इधर हरीश चौधरी ने मार ली बाज़ी, जानें पूरा मामला

कांग्रेस के बायतू से विधायक हरीश चौधरी के एक कदम ने पूरे बाड़मेर जिले में हलचल मचा दी है। उन्होंने अपने विधायक कोटे से शिव विधानसभा क्षेत्र के एक स्कूल के लिए 6 लाख रुपये की राशि स्वीकृत कर दी, ताकि उसका भवन बनाया जा सके। ये कदम न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक पहल है, बल्कि राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है, जो निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी को चुनौती देता नजर आ रहा है।
रविंद्र भाटी के मुद्दे को लपक लिए हरीश चौधरी
दरअसल, बाड़मेर कांग्रेस के जिला अध्यक्ष लक्ष्मण गोदारा ने सोशल मीडिया पर शिव क्षेत्र के राजकीय प्राथमिक विद्यालय आजाद नगर, गंगाला की दयनीय स्थिति की तस्वीरें साझा की थीं। यह विद्यालय भवन-विहीन है, और गोदारा ने अपनी पीड़ा जताई। रविंद्र सिंह भाटी, जो शिव के विधायक हैं, लेकिन वे इस पर जब तक कुछ सोच भी पाते, उससे पहले ही हरीश चौधरी ने तुरंत इस मुद्दे को लपक लिया। उन्होंने अपने विधायक कोटे से 6 लाख रुपये की अनुशंसा पत्र जारी कर दिया।
अपने ही क्षेत्र में शर्मिंदा हुए भाटी!
अब सवाल यह है कि क्या यह हरीश चौधरी का मास्टरस्ट्रोक है? जी हां, राजनीतिक गलियारों में इसे चौधरी की चालाकी माना जा रहा है, क्योंकि इससे उन्होंने न सिर्फ जनता का ध्यान शिक्षा मुद्दे पर खींचा, बल्कि भाटी को उनके ही क्षेत्र में शर्मिंदा भी कर दिया। हरीश चौधरी और रविंद्र सिंह भाटी के बीच राजनीतिक अदावत पुरानी है। भाटी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा के निशाने पर रहे, उनके कामों में रोड़े अटकाए गए, तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में बाड़मेर से निर्दलीय ताल ठोकी। वहां कांग्रेस उनका मुख्य प्रतिद्वंद्वी था, जिससे कांग्रेस में भी उनके दुश्मन बढ़ गए। राजनीति में ऐसे शह-मात के खेल आम हैं, लेकिन बाड़मेर इसमें हमेशा आगे रहता है। हरीश चौधरी ने अपनी विधानसभा छोड़कर शिव में घोषणा कर तहलका मचा दिया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।
अब क्या करेंगे रविंद्र भाटी?
अब सवाल उठता है - हरीश चौधरी के इस कदम के बाद रविंद्र सिंह भाटी का क्या होगा? वो क्या करेंगे? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कंपीटिशन से जनता को फायदा होता है, क्योंकि नेता विकास कार्यों पर फोकस करते हैं। लेकिन इससे सियासी तापमान बढ़ना तय है। क्योंकि बाड़मेर लंबे समय से सुर्खियों में छाया हुआ है... और इस घटना ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया। शिक्षा जैसे मुद्दों पर राजनीति होनी चाहिए, लेकिन क्या यह सिर्फ शर्मिंदा करने का तरीका है? हरीश चौधरी का यह कदम निश्चित रूप से उनके समर्थकों को मजबूत करेगा, जबकि भाटी को नई रणनीति बनाने पर मजबूर करेगा।
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